बीकानेर। राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्र में बारिश केवल मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि जीवन, खेती और उम्मीदों का आधार होती है। यही वजह है कि जब मानसून की रफ्तार धीमी पड़ जाती है और बादल बिना बरसे लौटने लगते हैं, तब बीकानेर में सदियों पुरानी आस्था फिर जीवंत हो उठती है। शहर के कुम्हारों के मोहल्ले में इन दिनों इंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए 16 दिवसीय अखंड कीर्तन चल रहा है। दिन हो या रात, भजन-कीर्तन का सिलसिला बिना रुके जारी हैं।यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि विश्वास का जीवंत उदाहरण है जहां मोहल्ले की महिलाएं सुबह अपने दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर शाम तक कीर्तन करती हैं, जबकि रात में पुरुष भक्ति की इस परंपरा को आगे बढ़ाते हैं। चौबीस घंटे चलने वाला यह कीर्तन पूरे मोहल्ले को एक सूत्र में बांधे रखता है।इस परंपरा की जड़ें बीकानेर के इतिहास में दर्ज छपनिया अकाल से जुड़ी मानी जाती हैं। बुजुर्ग बताते हैं कि उस भीषण अकाल के बाद लोगों ने वर्षा की कामना को लेकर सामूहिक रूप से इंद्र देव की आराधना शुरू की थी। समय के साथ यह एक परंपरा बन गई, जो आज भी हर वर्ष निभाई जाती है। पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन बारिश के लिए कीर्तन की यह आस्था आज भी वैसी ही मजबूत है।स्थानीय लोगों का दावा है कि जब-जब जिले में बारिश की कमी हुई और इस तरह का अखंड कीर्तन आयोजित किया गया, तब-तब अच्छी वर्षा हुई। शायद यही कारण है कि आधुनिक दौर में भी लोग इस परंपरा को पूरे विश्वास के साथ निभा रहे हैं। उनके लिए यह केवल पूजा नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान और सामूहिक उम्मीद का प्रतीक है।
इस वर्ष भी बीकानेर में अपेक्षित बारिश नहीं होने से किसानों की चिंता बढ़ी हुई है। खेतों में खड़ी फसलें पानी का इंतजार कर रही हैं। ग्रामीण इलाकों में लोग मानसून की बेरुखी को लेकर चिंतित हैं। ऐसे में अब सबको इंतजार है उन काली घटाओं का, जो रेगिस्तान की तपती धरती पर राहत की फुहार बनकर बरसें ।
बाइट आशा देवी,
बाइट भैराराम प्रजापत