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यूथ टीम से मेयर की रेस तक अनिल कल्ला… कभी मैदान में दिखते थे, अब बने मेयर

यूथ टीम से मेयर की रेस तक अनिल कल्ला… कभी मैदान में दिखते थे, अब बने मेयर

बीकानेर। नगर निगम चुनाव में कांग्रेस के अनिल कल्ला ने मेयर पद पर जीत हासिल की है।

अनिला कल्ला ने मेयर पद के

50 वोट मिले जबकि सुरेंद्र सिंह शेखावत को मिले 30 वोट मिले।राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जो अचानक चर्चा में नहीं आते, बल्कि लंबे समय तक पर्दे के पीछे अपनी जमीन तैयार करते रहते हैं। बीकानेर से मेयर पद के दावेदार अनिल कल्ला भी ऐसा ही एक नाम है। कभी यूथ टीम के साथ वार्डों में सक्रिय रहने वाले अनिल कल्ला अब नगर निगम के महापौर पद की सियासी रेस में हैं। कांग्रेस ने उन्हें वार्ड 73 से पार्षद बनने के बाद महापौर पद का प्रत्याशी बनाया है। सामने भाजपा ने वार्ड 13 से जीते डॉ. सुरेन्द्र सिंह को मैदान में उतारा है।अनिल कल्ला का राजनीतिक सफर आज से शुरू नहीं हुआ। शहर में आज सक्रिय कई युवा चेहरे जब राजनीति का मतलब समझना शुरू कर रहे थे, उस दौर में अनिल अपनी यूथ टीम के साथ मैदान में सक्रिय थे। वार्ड क्रिकेट प्रतियोगिताएं हों या राजीव यूथ क्लब के कार्यक्रम, युवाओं के बीच उनकी मौजूदगी लगातार दिखाई देती थी। यानी राजनीति की पिच पर बल्लेबाजी का अनुभव नया नहीं है।फिर आया वह दौर, जब एक चुनाव में डॉ. बीडी कल्ला की हार के बाद अनिल कल्ला कुछ समय के लिए सियासी तस्वीर से दूर हो गए। सक्रियता कम हुई, लेकिन पुराने साथियों से संपर्क बना रहा। लंबे अंतराल के बाद उन्होंने फिर राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों में कदम बढ़ाया। कोरोना काल में राजीव यूथ क्लब के जरिए गरीबों को राशन, आर्थिक मदद करना उनके राजनीतिक सामाजिक केरियर के लिए मील का पत्थर साबित हुआ, कोरोना काल के बाद धीरे-धीरे वे फिर पुराने राजनीतिक दायरे में दिखाई देने लगे। निगम चुनाव में कांग्रेस का टिकट मिलने के बाद उनकी बदली कहानी। नगर निगम चुनाव में वार्ड 73 से कांग्रेस का सिंबल हाथ में आते ही अनिल कल्ला के लिए राजनीतिक तस्वीर बदल गई। पुराने साथी फिर साथ आए, कार्यकर्ताओं में भी सक्रियता दिखाई दी और चुनाव परिणाम में वे पार्षद बनकर निगम पहुंचे। अब पार्टी ने महापौर पद के लिए नाम आगे कर दिया तो पुराने राजनीतिक सफर की फाइल भी फिर खुल गई। हालांकि चुनाव जीतने के बाद उन पर परिवार वाद के आरोप भी लगे लेकिन उन्होंने इसे सिरे से खारिज करते हुए कहा कि मुझे 30 साल राजनीति करते हो गए, मै चुनाव जीतकर आया हूं ऐसे में परिवारवाद का आरोप लगाया जाना मेरे विरोधियों की साज़िश है। वहीं दूसरी तरफ भाजपा के सामने भी आंकड़ों का खेल कम दिलचस्प नहीं है। भाजपा से टिकट मांगने वाले कुछ चेहरे निर्दलीय मैदान में उतरे और चुनाव जीतने के बाद भी खुद को भाजपा के साथ बता रहे हैं। ऐसे में महापौर चुनाव में सिर्फ पार्टी के घोषित प्रत्याशी ही नहीं, बल्कि उन पार्षदों के रुख पर भी निगाहें टिकी हैं।फिलहाल कांग्रेस अपने पार्षदों को एकजुट बता रही है। भाजपा भी अपने समीकरणों को लेकर सक्रिय है। शहर के चौक-पाटों से लेकर राजनीतिक बैठकों तक अब एक ही सवाल घूम रहा है—अनिल कल्ला की पुरानी राजनीतिक पहचान और वर्तमान समीकरण मिलकर क्या नया अध्याय लिखेंगे?मेयर पद के लिए आज मतदान होगा और आज साफ होगा कि यूथ टीम के साथ कभी वार्डों में घूमने वाला यह चेहरा नगर निगम की सबसे बड़ी कुर्सी तक पहुंचता है या सियासत की पिच पर मुकाबला कोई और मोड़ लेता है।

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