बीकानेर। अस्पताल सिर्फ इलाज का केंद्र नहीं होता, बल्कि वह जगह होती है जहां दर्द में डूबे मरीज और उनके परिजन राहत, सहारे और संवेदनशीलता की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं। लेकिन संभाग के सबसे बड़े अस्पताल पीबीएम अस्पताल में सामने आए दो वीडियो ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या व्यवस्था के साथ-साथ मानवीय संवेदनाएं भी कमजोर पड़ गई हैं। वायरल वीडियो में एक ओर सड़क हादसे में घायल युवक को जांच के लिए अस्पताल परिसर में बाइक से स्ट्रेचर खींचकर ले जाना पड़ा, तो दूसरी ओर एक बीमार और चलने-फिरने में असमर्थ महिला को उसका बेटा गोद में उठाकर जांच केंद्र तक पहुंचाने को मजबूर दिखा। दोनों घटनाएं केवल अव्यवस्था की कहानी नहीं कहतीं, बल्कि मरीजों के प्रति संवेदनशील व्यवस्था के अभाव को भी उजागर करती हैं।ट्रोमा सेंटर में भर्ती एक घायल युवक को सोनोग्राफी जांच के लिए मुख्य भवन भेजा गया। परिजनों का कहना है कि मरीज को ले जाने के लिए समय पर कोई एम्बुलेंस या अन्य सुविधा उपलब्ध नहीं हो सकी। ऐसे में उन्होंने स्ट्रेचर को बाइक के सहारे खींचकर मरीज को जांच कक्ष तक पहुंचाया।जिस मरीज को तत्काल देखभाल और सुरक्षित परिवहन की जरूरत थी, उसके परिजनों को खुद ही व्यवस्था करनी पड़ी। यह दृश्य अस्पताल में मौजूद लोगों के लिए भी किसी सदमे से कम नहीं था ,इसी दौरान एक और तस्वीर सामने आई जिसने लोगों को भावुक कर दिया। टीबी अस्पताल से जांच के लिए आई एक महिला चलने में असमर्थ थी। परिजनों को जो स्ट्रेचर मिला, वह उपयोग योग्य नहीं था क्योंकि उसमें पहिए नहीं थे। मां की हालत देखकर बेटे ने इंतजार करने के बजाय उसे अपनी गोद में उठाया और जांच के लिए लेकर चला गया। बाद में सिटी स्कैन के लिए भी उसे अस्पताल से बाहर ले जाना पड़ा क्योंकि संबंधित मशीन बंद बताई गई।अस्पताल में मशीन खराब होना या संसाधनों की कमी होना अलग बात है, लेकिन मरीजों को बुनियादी सहायता तक नहीं मिलना चिंता का विषय है। जब गंभीर मरीजों और बुजुर्ग महिलाओं को अस्पताल परिसर में इधर-उधर ले जाने की जिम्मेदारी पूरी तरह परिजनों पर छोड़ दी जाए, तो यह केवल संसाधनों की कमी नहीं बल्कि मानवीय संवेदनाओं की कमी भी प्रतीत होती है।संभाग के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में यदि मरीजों को स्ट्रेचर, एम्बुलेंस और जांच सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़े, तो आमजन का भरोसा प्रभावित होना स्वाभाविक है। सोमवार रात सामने आए ये दृश्य याद दिलाते हैं कि स्वास्थ्य सेवाओं में केवल भवन और मशीनें ही नहीं, बल्कि संवेदनशील व्यवस्था और मानवीय दृष्टिकोण भी उतने ही जरूरी हैं। मरीजों को इलाज के साथ सम्मान और सहारा मिले, यही किसी भी अस्पताल की सबसे बड़ी पहचान होनी चाहिए।