बीकानेर: नौ दशक पुरानी उर्दू रामायण में छिपा आज के भारत का संदेश, दीपावली पर उर्दू में गूंजे राम के आदर्श
बीकानेर।धर्म और मजहब के नाम पर बढ़ती दूरियों के बीच बीकानेर ने दीपावली पर देश को आपसी सौहार्द और साझा संस्कृति का खूबसूरत संदेश दिया। मरुधर हैरिटेज में महफिल-ए-अदब की ओर से आयोजित उर्दू रामायण के पाठ में जब उर्दू के अल्फाजों में रामकथा के प्रसंग गूंजे तो भारतीय संस्कृति की गंगा-जमुनी तहजीब साकार हो उठी। कार्यक्रम में सर्वधर्म के लोगों ने शिरकत कर आपसी भाईचारे और एकता का संदेश दिया।इस आयोजन की खासियत करीब नौ दशक पुरानी साहित्यिक विरासत है। वर्ष 1936 में लखनऊ के मौलवी बादशाह हुसैन रा’ना ने उर्दू में रामायण की रचना की थी। वे बीकानेर रियासत में लंबे समय तक शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े रहे और यहां के कॉलेज में प्रोफेसर के रूप में सेवाएं दीं। उनकी इस रचना को बनारस में आयोजित अखिल भारतीय प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार मिला था महफिल-ए-अदब की ओर से हर साल दीपावली पर उर्दू रामायण का पाठ आयोजित किया जाता है। यह आयोजन केवल साहित्यिक परंपरा का निर्वहन नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने वाली सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का प्रयास भी है। कार्यक्रम में शामिल लोगों का कहना था कि आज जब धर्म के नाम पर लोगों को बांटने की कोशिशें हो रही हैं, तब उर्दू में रामायण का पाठ देश की साझा संस्कृति और आपसी सम्मान की अहमियत बताता है। जहां धर्म का नाम आते ही लोगों की मानसिकता संकीर्ण हो जाती है,वहीं यह आयोजन संदेश दे गया कि राम के आदर्श किसी एक भाषा या समुदाय तक सीमित नहीं हैं। भाषाएं और आस्थाएं भले अलग हों, लेकिन प्रेम, इंसानियत और भाईचारे का संदेश पूरे देश की साझा विरासत है।
*बाइट जिया उल हसन कादरी,शायर, आयोजनकर्ता।*
*बाइट हाजी फरमान अली, मुस्लिम धर्मगुरु।*