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अंतरराष्ट्रीय ऊंट उत्सव: न रंग, न ब्रश….कैंची के हुनर से ऊंट बना चलता-फिरता कैनवास

अंतरराष्ट्रीय ऊंट उत्सव: न रंग, न ब्रश….कैंची के हुनर से ऊंट बना चलता-फिरता कैनवास

बीकानेर। अगर कोई कहे कि यहां कला बोलती नहीं, चलती है… तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। बीकानेर में कला कागज या दीवारों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सीधे ऊंट की पीठ पर उतर आती है। रेगिस्तान का यह जहाज जब सजे-धजे अंदाज में चलता है, तो लगता है मानो रेत पर कोई कलाकार अपनी कल्पना को टहलने के लिए छोड़ आया हो।

यहां न ब्रश होता है, न रंगों की बाल्टी। बस कैंची, अनुभव और पीढ़ियों से चला आ रहा हुनर। ऊंटों के बाल इतनी महीन कलात्मकता से काटे जाते हैं कि उनके शरीर पर फूल खिल उठते हैं, सिर पर पानी की मटकी लेकर चलती पनिहारी,दो बैलों की जोड़ी,हाथी,शेर,लहरदार बेलें उभर आती हैं और पारंपरिक आकृतियां पर करीने से की गई कतरन महीनों की मेहनत के बाद मानो सजीव हो जाती हैं। एक पल को तो देखने वाला भूल ही जाता है कि यह कोई तस्वीर नहीं, बल्कि जीवित कैनवास है।बीकानेर में 9 से 11 जनवरी तक होने वाले अंतरराष्ट्रीय ऊंट उत्सव से पहले यह कला अपने पूरे शबाब पर होती है। साल में सिर्फ एक बार ऊंट पालक अपने ऊंटों को इस खास श्रृंगार से सजाते हैं। महीनों रेगिस्तान में सादगी से रहने वाले ऊंट, इन दिनों किसी शाही मेहमान से कम नहीं लगते। जब ये कलात्मक ऊंट उत्सव के मैदान में कदम रखते हैं, तो हर नजर ठहर जाती है, हर कैमरा खुद-ब-खुद उनकी ओर घूम जाता है। ऐसा लगता है जैसे बीकानेर की परंपरा खुद चलकर लोगों से मिलने आई हो। ऊंट की पीठ पर उभरी आकृतियां सिर्फ कारीगरी नहीं, बल्कि परंपरा, धैर्य और हुनर की विरासत हैं। अंतरराष्ट्रीय ऊंट उत्सव में ये चलते-फिरते कैनवास यह एहसास कराते हैं कि बीकानेर में कला कहीं टंगी नहीं होती वह रेत पर चलती है, सांस लेती है और हर देखने वाले के दिल में अपनी छाप छोड़ जाती है।

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