बीकानेर। बीकानेर में होली के अवसर पर एक बार फिर सदियों पुरानी अनूठी परंपरा जीवंत हो उठी। यहां टका लेने की परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और उल्लास के साथ निभाई जाती है। होली के रंगों के बीच पारंपरिक गीतों और चंग की थाप पर गेवर निकाली गई, जिसने शहर की सांस्कृतिक विरासत को फिर से सजीव कर दिया।
दोपहर करीब ढाई बजे लालाणी व्यासों के चौक से गेर की शुरुआत हुई। आज बधावो ओ दिन नीको ईये, गेवरियों रे काढ़ो लस-लस टीको, चोखा चोखा चावल्ल लस-लस टीको… जैसे पारंपरिक लोकगीतों की गूंज के साथ लोग आगे बढ़े। माथे पर लंबा तिलक, सिर पर साफा और रंग-बिरंगी पगड़ी, हाथों में छड़ी और चंग की थाप पर थिरकते कदम हर दृश्य में होली की मस्ती और परंपरा का संगम नजर आया।होली के उल्लास में सैकड़ों वर्षों पुरानी रस्म के तहत एक विशेष जाति की महिला से रुपये लेने की परंपरा भी निभाई गई। यह टका लेने की रस्म इस आयोजन का प्रमुख आकर्षण रही, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।गेर लालाणी व्यासों के चौक से रवाना होकर कीकाणी व्यासों के चौक पहुंची, जहां खड़े लोगों ने भी उत्साहपूर्वक इसमें भागीदारी की। इसके बाद व्यासों का चौक, ओझाओं का चौक, बिन्नाणी चौक और सर्राफा बाजार होते हुए गेर पुनः लालाणी व्यासों के चौक पहुंची और विधिवत संपन्न हुई।इस आयोजन में झूठा पोता परिवार के सदस्य भी शामिल हुए। लालाणी व्यास जाति की ओर से जयनारायण व्यास, मक्खनलाल व्यास, कानूलाल व्यास, भंवरलाल व्यास, केदार व्यास, मदन गोपाल व्यास और शिव प्रकाश व्यास सहित कई लोगों ने सक्रिय भागीदारी निभाई। वहीं कीकाणी व्यासों की ओर से नारायणदास व्यास, बृजेश्वर लाल व्यास, गोपाल व्यास, भरत, शिवकुमार, श्याम, अरविंद, अरुण, गोवर्धन और बिट्टू सहित अन्य लोगों ने भी परंपरा को आगे बढ़ाया।