बीकानेर। चैत्र नवरात्रि के पावन दिनों में बीकानेर का एक कोना ऐसा भी है, जहां आस्था और वैभव एक साथ नजर आते हैं। चांदमल की गणगौर का दरबार जो साल में महज दो दिन के लिए सजता हैं। करीब 150 साल पुरानी माँ पार्वती का स्वरूप गणगौर की यह प्रतिमा जब खुले चौक में विराजती है, तो उसका वैभव देखते ही बनता है। हीरे, कुंदन और सोने के करोड़ों रुपये के गहनों से सजी माँ की झलक किसी राजसी खजाने से कम नहीं लगती। माथे से लेकर चरणों तक सजे करोड़ों रूपयों के आभूषणों की चमक दूर से ही श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींच लेती है।लेकिन इन गहनों की असली कीमत उनकी चमक में नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी आस्था की कहानियों में छिपी है। मान्यता है कि जिन भक्तों की मन्नत पूरी होती है, वे माँ को गहने अर्पित करते हैं। यही वजह है कि समय के साथ यह श्रृंगार और भी समृद्ध होता गया,और आज यह दरबार आस्था के साथ-साथ वैभव का भी प्रतीक बन चुका है।
करोड़ों के इन गहनों के चलते पूरे आयोजन स्थल को हाई सिक्योरिटी जोन में तब्दील कर दिया जाता है। चारों ओर पुलिस का कड़ा पहरा, हर गतिविधि पर पैनी नजर और हथियारबंद जवानों की तैनाती यह सब मिलकर इस दरबार को और भी खास बना देते हैं। श्रद्धालु भले ही भक्ति में डूबे हों, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था हर पल सतर्क रहती है।
इस परंपरा के पीछे भी एक गहरी मान्यता जुड़ी है। कहा जाता है कि उदयमल नामक व्यक्ति, जो संतान सुख से वंचित थे, उन्होंने माँ गणगौर की आराधना की। एक वर्ष बाद उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, अपनी मनोकामना पूर्ण होने पर उदयमल ने गणगौर को उस वक्त लाखों रुपए के जेवर अर्पित किए थे । अपने पुत्र का नाम चांदमल रखा गया। तभी से यह प्रतिमा चांदमल की गणगौर के नाम से प्रसिद्ध हो गई और यह परंपरा आज तक चली आ रही है।
दरबार के दौरान महिलाएं बड़ी संख्या में पहुंचती हैं पुत्र प्राप्ति, सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना लेकर। माँ के समक्ष नृत्य, चुनरी ओढ़ाना, नारियल और बताशे चढ़ाना, ये सब इस परंपरा का हिस्सा हैं। मन्नत पूरी होने पर अपने बच्चों को माँ के चरणों में धोक दिलाने की परंपरा भी यहां विशेष रूप से निभाई जाती है।