बीकानेर। मरुस्थलीय राजस्थान की जीवनरेखा कही जाने वाली खेजड़ी के अस्तित्व पर संकट गहराता जा रहा है। सोलर प्रोजेक्ट्स के नाम पर प्रदेश के अलग-अलग इलाकों में हो रही खेजड़ी कटाई के खिलाफ अब जनआक्रोश खुलकर सामने आने लगा है। बीकानेर में बिश्नोई धर्मशाला के सामने शुरू हुआ महापड़ाव इसी आक्रोश का प्रतीक बन गया है। पेड़ पौधों वन्यजीवों को बचाने के इस महापड़ाव में साधु-संतों के साथ लगभग 400 पर्यावरण प्रेमी और मातृशक्ति अन्न जल त्याग कर अनशन पर बैठ गए हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि खेजड़ी केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि पर्यावरण, पशुपालन और मानव जीवन का आधार है। इसके बावजूद विकास के नाम पर लगातार इसका विनाश किया जा रहा है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए घातक साबित होगा। आंदोलन से जुड़े लोगों ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने उनकी मांगों पर विचार नहीं किया तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा। सभी आंदोलनकारियों द्वारा सामूहिक अनशन शुरू करने का भी ऐलान किया गया है।महापड़ाव में बिश्नोई समाज के साथ-साथ सर्व समाज के प्रतिनिधि, पर्यावरण कार्यकर्ता और बड़ी संख्या में महिलाएं मौजूद हैं। महिलाओं की भागीदारी ने आंदोलन को नई ताकत दी है और यह संदेश दिया है कि पर्यावरण संरक्षण केवल किसी एक समाज का नहीं, बल्कि पूरे समाज का मुद्दा है। खेजड़ी बचाओ आंदोलन की गूंज अब प्रदेश की सीमाएं पार कर चुकी है। पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों से भी लोग बीकानेर पहुंचकर आंदोलन को समर्थन दे रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि खेजड़ी कटाई का मुद्दा अब राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण चिंता का विषय बनता जा रहा है।
आंदोलनकारियों की मांग है कि खेजड़ी कटाई पर तत्काल रोक लगे, सोलर प्रोजेक्ट्स के लिए स्पष्ट और सख्त नियम बनाए जाएं तथा दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई हो। बीकानेर से उठी यह आवाज अब सरकार के लिए एक बड़ी परीक्षा बन गई है कि आखिर विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कैसे साधा जाए।